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Saturday, December 22, 2012

दिलरुबा

PHOTO & GRAPHICS DESIGN BY R. K. SRIVASTAVA

            

       














         दिलरुबा
दिल में मंदिर की घंटी  जैसे  बजने लगी है,
लो वो आ गई ,   मेरी  दिलरुबा आ गई है।

चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
चाँदनी में नहाई , वो खड़ी सामने,
चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
एक नज़र में उतर गई, दिलों-जान में।

थी परेशानी  में, आँसू थे आँखों में,
वो घबराई हुई, खड़ी थी मेरे सामने,
चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
मैं तो खो ही गया था, उसके ख्याल में।

सर्द सी रात में, थी काले लिबास में,
लड़खड़ा कर  गिरी, मैं लगा थामने,
चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
वो नजर आई, काले बादलों  से घिरे चाँद में।

न थे हम होश में, न थी वो होश में,
हालातों को देख,सब-कुछ लगा जानने,
चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
मैंने उसको समेटा, अपनी बाहों में।


चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
चाँदनी में नहाई , वो खड़ी सामने,
चाँदनी रात में, चाँद के साथ में,
इस तरह मेरे  दिल को, दिलरुबा मिल गई।

                                                                 -राकेश कुमार श्रीवास्तव 


हैप्पी क्रिश्मस  !


Wednesday, December 19, 2012

आत्म-समर्पण

PHOTO-KRISHNA, MODEL & GRAPHICS DESIGN BY R. K. SRIVASTAVA
   

 आत्म-समर्पण


बीते       हुए,  हर   एक पल को
चाहकर भी, भुलाया नहीं जाता

दिल से सभी बातों  को
यूँ ही लगाया नहीं जाता

जिस पल तुम मिली, उस पल को
चाहे  तो  भी  मिटाया, नहीं जाता

समझ गई  तुम,  मेरे   एहसासों   को
समझे हुए को, समझाया नहीं जाता

मैं तैयार था, सबकुछ बताने को
तुम  से   तो, पूछा भी नहीं जाता

तुम छोड़ कर चली गई, हमें  मरने  को
अपनो को ऐसी सजा, दिया नहीं जाता

देखता हूँ, अपने अहंकार की दीवारों को
तोड़कर इसको,तुम्हें बुलाया नहीं जाता

आओगी,  उम्मीद    थी  इन  आँखों  को
आसुओं के, सैलाब को रोका नहीं जाता

संग जीने की, आदत हो गई थी मुझको
तेरे बिना अब,   जिया   भी   नहीं जाता

अब आ जाओ, कर दो गुलजार मेरी दुनिया को
तेरे दर पे खड़ा हूँ,  यहाँ  से   जाया  नहीं   जाता

बदल डालूँगा  तुम्हारी  खातिर, अपनेआप  को
इससे ज्यादा आत्म-समर्पण, किया नहीं जाता


                                                                                -राकेश कुमार श्रीवास्तव 

Monday, November 19, 2012

भारत माँ

                             भारत   माँ  




तू  तो मेरी प्यारी माँ ,
तेरी शान निराली माँ  ।
तेरे आँचल में हरियाली ,
सर पे ताज हिमालय माँ  ।।
                                                              करोड़ो बहती सरिता तुझ में,
                                                               बनकर रुधिर वाहिका तन में ।
                                                              अगल-बगल सागर लहराती,
                                                              पाँव हिंद महासागर पखारती ।।
तुझ में सृष्टि की सारी रचना,
नदी झील सागर और झरना ।
मरुस्थल पर्वतों का क्या कहना,
लगता है जैसे हो सपना ।।
                                                             खनिज संपदा वनस्पति अपार है,
                                                            जलीय-जीव पशु-पक्षी नाना-प्रकार है ।
                                                            तेरे कारण यहाँ जीवन आसान है,
                                                           कैसे न कहूँ माँ तू  महान है ।।
ऋतु मौसम ऐसे सजा है,
सभी दिशाओं में विभिन्न फिज़ा है ।
ऐसा नज़ारा और कहाँ है,
सारे विश्व का रूप यहाँ है  ।।
                                                         लूटने आया जो भी  तुझको,
                                                         ऐसे रिझाया तुमने उसको  ।
                                                        वो तेरा गुलाम हो गया,
                                                        कदमों  में तेरी दो जहाँ पा गया  ।।
अनेक रंग जाति और भाषा ,
सभी भारतीयों  की एक ही आशा ।
हमारा भारत बने महान,
इसके लिए हम दे दें जान ।।
                                                      तेरी सेवा किए ज्ञानी-विज्ञानी,
                                                     कण-कण में संतों की वाणी ।
                                                     कभी तेरे काम आ जाऊ माँ ,
                                                    हँसते हुए  शीश चढ़ाऊ माँ ।।

राकेश कुमार श्रीवास्तव 



Thursday, November 1, 2012

जीवन का अस्तित्व-एक विचार


जीवन का अस्तित्व-एक विचार 

पानी की बूंद की उत्पत्ति का रहस्य भी अजीब है | मैंने बहुत  सोचा, परन्तु समझ न सका , कहाँ से आया और इसका क्या हश्र होगा? खैर ! बूंद, जिसकी शायद नियति ही थी उसकी  उत्पत्ति का कारण|

  बूंद तो अपने आप में मग्न थी क्योंकि वह अपने आप को बादल का एक सदस्य समझ कर अनेक बूंदों के साथ आकाश में विचरण कर रही थी  परन्तु एक दिन अचानक अपने आप को धरती की तरफ गिरते हुए  महसूस किया  और इस गिरने में भी, वह अपने आप में आनन्द की अनुभूति  महसूस कर रही  थी। बूंद वाकई भाग्यशाली थी  कि वह नदी में जा गिरी   एवं लहरों के साथ ऐसे जा मिली  कि यह  भूल गई कि वह बादलों के साथ कभी आकाश में विचरण करती  थी | नदी  के मध्य, लहरों में हिलोरें लेते हुए अभी आगे बढ़ रही थी। अचानक वह किनारे कि तरफ चली गई  और अपने आप को एक पत्थर से टकराते हुए महसूस किया और उछल कर फिर नदी के मध्य में जा मिली | आश्चर्य! बूंद फिर भी नहीं टुटी , लेकिन  बूंद को पाँच-दस पत्थर से टक्कर के बाद वह समझ गई  कि अब उसकी नियति पत्थरों से टकरा कर फिर नदी में मिल जाना ही है | फिर एक  दिन नदी के किनारे किसी महापुरुष के वाणी से पता चला कि नदी की  मुक्ति, सागर में मिलने पर ही है|बूंद अब इस एहसास के साथ समय बिताने लगी  कि सागर में किसी प्रकार जा कर मिले तो शायद उसे  भी मुक्ति मिले, चूँकि नदी भी उन  जैसों से ही तो बनी  है ।

एक दिन ऐसा आया, बूंद ने अपने आप को अथाह सागर की  गोद में पाया परन्तु बूंद की किस्मत फिर भी नहीं सुधरी उसकी हालत पहले से और खराब हो गई पहले लहरों की आपस की लड़ाई फिर चट्टानों से टकरा-टकरा कर अपना सर फोडती  रही ,  फिर भी वह नहीं टूटी  लेकिन अंदर ही अंदर काफी टूट चुकी थी | वह संवेदनहीन हो कर सागर की  लहरों में शामिल होती  और चट्टानों से टकराती।

एक दिन वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी  कि उसने थकी हुई आँखों से देखा तो उसे विश्वाश  न हुआ कि उसकी आकृति बूंद की तरह न होकर लम्बी धुँए की तरह हो गई और वह धरती से आकाश की ओर उड़ रही थी । असीम  शांति ! इस आनन्द की अनुभूति में कब आँखें बंद हो गई पता ही नहीं चला | जब ऑंखें खोली तो उसने  अपने आप को बादलों के बीच  पाया |

उफ्फ ! यह सफ़र कब तक ......    अपना जीवन भी निरंतर ऐसे ही चलता  रहता  है| जब हम बचपन में माँ-बाप के साथ रहते हैं तो   मजे की जिन्दगी जीते हैं| जब जवानी आती है तो कुछ दिन मज़े में काटते हैं, फिर जिम्मेदारी को निर्वाह करने हेतु अपने ही जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा करते हैं, एवं अधिक पाने के लिए गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच संवेदनहीन जीवन जीते हुए मौत को गले लगाकर इस दुनिया में फिर जन्म लेते है..................

बूंद की  परिणति अब सब ने है जानी,
जम गई तो बर्फ,
उड़ गई तो वाष्प
नहीं तो पानी ।
जीवन की  भी कुछ ऐसी ही है कहानी,
जड़ हो गए तो तमोगुणी,
सम हो गए तो सतोगुणी
और रम गए तो रजोगुणी|

-राकेश कुमार श्रीवास्तव

Thursday, October 25, 2012

जीवन साथी



       (पृष्ठभूमि :- स्त्री-पुरुष परस्पर पति-पत्नी के संबंध में जीवन  के बहुमूल्य समय व्यतीत करते है, पत्नी अपनी पुराने सभी संबंधो  को भुलाकर   नए संबंधो को आत्मसात  करने में  शेष जीवन  गुजार  देती है | विडंबना  यह है  कि  उसके जीवन  के अंतिम समय में केवल उसका   पति ही उसके होने या खोने का अर्थ जान पाता है | )



जीवन साथी

मेरे अंधेरे जीवन में,
तुम हो  सूरज की पहली किरण।
जब  भी गमों ने  घेरा है,
तुम ही लाई हो ख़ुशी  के  क्षण।
मैं भटका हूँ  पथ से कभी ,
तुमने दिखाया है मुझको दर्पण।
जब भी माँगा साथ तुम्हारा,
सदा दिया है मुझको समर्थन।
मेरे जीवन में खुशियों की  खातिर,
तुमने किया है जीवन अर्पण।
अब  तुम नहीं हो  नश्वर जगत में ,
कैसे आओगी खुश करने मेरा मन।
मैं तो कठोर अभिमानी  था,
तेरा मर्म न जान  सका,
मुझको तुम  तो माफ ही करना,
मैं तो हूँ अब तेरी शरण।
-राकेश कुमार श्रीवास्तव

सफ़र 



  (पृष्ठभूमि :- नायक अपनी नायिका को छोड़ कर किसी विशेष कार्य हेतु रेलगाड़ी  से  लम्बी  यात्रा  पर  निकलता   है   और  विरह  कि  आग  मै  जल  रहा   है |  इस जलन को  कम करने लिए नायक , नायिका  को याद   करते   हुए   अपने  मनोभाव को व्यक्त करता है | )


सफ़र 

तुझे छोड़ कर मै, सफ़र कर रहा हूँ,
मगर मेरे साथ, सदा चल रही है|
सुबह मै चला था, तू मेरे संग थी,
तेरी यादों में खोया , दिन भर  चला हूँ|
शाम हो रही है, सूरज ढल चुका  है,
मगर तू मेरे संग, चली जा रही है|
तेरे ख्यालों में , जिए जा रहा हूँ,
कभी हँस रहा हूँ, कभी मुस्कुरांऊँ   |
मुझे देख कर, लोग कर रहे इशारे,
मैं हो गया दीवाना, ये समझा रहे हैं|
चाँद आ गया, मगर तू वहीं है,
चाँद में भी बस, तुम्ही नजर आ रही हो|
तुझे भूलने की, जतन   मैंने की है,
सम्पूर्ण क्षितिज पर, तू छा गई है|
आँखें मूंदकर मैं, अब सोने लगा हूँ,
तेरी याद और भी, गहरा गई है|
अब मैं सो रहा हूँ, नींद आ गई है,
सपनों  में, तुम्हारी  याद आ रही है|
सुबह हो गई है, मैं जग गया हूँ,
चादर के सलवटों पे, तुझे ढूंढ़ रहा हूँ| 
अभी तू कहीं है, मगर मेरे दिल में,
मेरे साथ तू भी, सफ़र कर रही है|
तेरी याद न जाएगी, तू कहीं भी चली जा,
तेरी याद के बगैर, मैं जी न सकूँगा|
तुझे भूलाने का अब, जतन  न करूँगा,
तुझे छोड़ कर, अब सफ़र न करूँगा|
-राकेश कुमार श्रीवास्तव
(२९/०४/२००७)
३.

Monday, October 22, 2012

आशा


                      आशा 


तुम तो  इंसां     हो,
फिर भी  परेशां हो|
पा जाओ इससे   मुक्ति,
कर लो आशा से दोस्ती ।।
                                           राह न असां  हो,
                                           घोर निराशा हो।
                                           करना नहीं कोई गलती ,
                                           कर लो आशा से दोस्ती ।
बुरी संगति जीवन में,
मत पड़ो    व्यसन में ।
सुधार कर  अपनी संगति ,
कर लो     आशा से दोस्ती ।।
                                           मुश्किल डगर में ,
                                           नौका फंसी भंवर में।
                                           काम आए प्रभु की भक्ति ,
                                           कर लो आशा  से दोस्ती ।।
अनमोल    जीवन    है,
कुछ भी नहीं कठिन है।
तुम में है   बहुत   शक्ति ,
कर लो आशा से दोस्ती ।।


                                           

Tuesday, October 16, 2012

तन्हां

तन्हां

तन्हां तन्हां रह गया हूँ मैं।
आकर तन्हाईयों को दूर करो।।

मैं अँधेरों से घिरा रहता हूँ ।
प्यार का दीप जलाकर इसे गुलज़ार करो ।।

तेरी जज्बातों से मैं खेला हूँ ।
मेरी गुस्ताखियों को माफ़ करो ।।

लौट आओं हमारी दूनियाँ में ।
मौका देकर मुझ पे एहसान करो।।

जी नहीं सकता हूँ अब तेरे बगैर ।
आकर जीने का इंतजाम करो ।।

यकीं मुझ पे करो, ये असां तो नहीं ।
लौट आओं , मेरे एहसास को जिन्दा कर दो ।। 

Monday, September 24, 2012

येन केन प्रकारेण


हमको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण!

गरीब को चाहिए रोटी,
पूरी करनी है ,
जरूरतें छोटी-मोटी ,
इसको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण!

विद्यार्थी को चाहिए नंबर ,
रहन-सहन में आडंबर ,
इसको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण!

पत्नी को चाहिए जेवर ,
पति को दिखा के अपना तेवर,
इसको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण!

बाबू  हो या अधिकारी,
चाहिए महँगी गाड़ी ,
चाहे लेना पड़े रिश्वत भारी ,
इसको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण!

नेता को चाहिए वोट ,
और भ्रष्टाचार से नोट,
इसको भइया सबकुछ  चाहिए ,
येन केन प्रकारेण! 

भुखमरी , बेरोज़गारी , 
रिश्वतखोरी और कालाबजारी ,
सब पे है ये भारी,
चाहे नेता हो या जनता,
गरीब हो या व्यापारी,
बाबू हो या अधिकारी ,
आओ ! इससे मुक्ति पाएँ ,
येन केन प्रकारेण!
राकेश कुमार श्रीवास्तव 

23/09/2012

                                     

Thursday, July 12, 2012

तुम

  तुम



तुमको इतना याद किये की, खुद को भूले हम ,

तेरी हँसी में मेरी ख़ुशी, आसूं में मेरे ग़म ।


दिया मुश्किलों में साथ ऐसा की, आखें हो गई नम ,

तुने प्यार से नजरें झुकाई , फासले हो गए कम।


तेरी साँसों की सरगम ऐसी की, भूले खुद को हम,

बाहें ऐसे  फैलाई की , दूरियाँ हो गई कम ।


तुमको इतना याद..................................                       

Monday, April 9, 2012

कविता-ख्वाहिश

(पृष्ठभूमि :- ये जीवन की त्रासदी है की पति या पत्नी ,एक ही घर के छत के नीचे रहते हुए अलग अलग
                                                  सपनों के साथ जीते है और ताउम्र  एक दुसरे से असंतुष्ट रहते हुए तन्हाई का जीवन जीते 
                                                  है।)


ख्वाहिश

गुनगुनाने की चाह अपने घर में और,
रोने को मुझको एक कोना न मिला ।
कई   सपनें   देखे   अपने   मन   में       और   ,
सपनों को सच करने का आसरा न मिला।
मातम से घिरा रहता हूँ    अपने ही घर में  और.
महफ़िल-ए-रंग  जमाते हुए मैं सब को मिला।
अपनापन  ढूंढ़ने  लगा बेगानों में और.
खुल कर हँस सकूँ ऐसा  मौका न मिला।
                                  कोई मुझे अपने घर में जिन्दा कर दो,
                                   मुर्दा पड़ा हूँ, मुझे सुपुर्द-ए-खाक न मिला।

-राकेश कुमार श्रीवास्तव (०९/०४/२०१२) 

                                                      ,

Tuesday, March 27, 2012

प्रेम गीत


(पृष्ठभूमि :- लड़का एवं लड़की के  परिवारों के बीच मधुर संबंधो के कारण  वे  एक दुसरे प्रति अपना 
                      प्यार या भावनाएं  प्रगट नहीं कर पाते और अलग अलग जीवन  जीने को मजबूर होते हैं )





प्रेम    गीत   

काश  हम  अजनबी  तेरे  लिए  होते  
इजहारे  मोहब्बत , सरेआम  किये  होते
काश  तुम ......
जब  से  ये  जाना  मोहब्बत  का  नाम 
मोहब्बत  को  दे  दिया  तेरा  ही  नाम 
मोहब्बत  का पैगाम , कब  का  पेश  कर  दिए  होते
काश  तुम  ......
मेरे  होठ  सिले  के  सिले  रह  गए
इजहारे  मोहब्बत , न  हम  कर  सके
मोहब्बत  है  तुझसे , हम  तुमको  बता  देते
काश  तुम ......
तेरा  नाम  लेके  मै  जीती  रही
तेरा  नाम  लेके  मै  मरती  रही
तुम  करते  हो  प्यार  मुझसे
काश  पहले  ही  बता  देते
काश  हमदोनो  एक  दुसरे  को  बता  देते
काश  हम  अजनबी  तेरे  लिए  होते  
इजहारे  मोहब्बत , सरेआम  किये  होते

-राकेश कुमार श्रीवास्तव 








Wednesday, February 29, 2012

सास पुराण





पाठको ! सास का ख्‍याल आते ही मैं कॉंपने लगता था, मेरी सॉंसें उखड़ने लगती थीं । हालाँकि, मैं अपनी पत्‍नी से डरता नहीं हूँ, फिर भी आप से अनुरोध है कि कृपया इस रचना को मेरी पत्‍नी को पढ़ने के लिए नहीं दीजिएगा, क्‍योंकि, इस रचना को अगर मेरी पत्‍नी ने पढ़ लिया तो वह मेरी ऐसी हालत कर देगी कि मैं आपके लिए दूसरी रचना पेश करुँ, ऐसी स्थिति नहीं रहेगी । तो आइए, मैं बजरंग बली का नाम लेकर आपको यह बताऊँ कि मैं अपनी सास का बलि का बकरा कैसे बना?       
यह मेरा दुर्भाग्‍य है कि मेरे कुँआरे जीवन की कोई भी रात ऐसी नहीं बीती जिसमें एक भयानक चेहरा मेरे सपनों में न आया हो और वह भयानक चेहरा किसका हो सकता है यह आप अनुमान लगा लें । वैसे मैं बजरंग बली का भक्‍त हूँ और भूतप्रेत से डरता नहीं हूँ ।

यह बात उन दिनों की है जब मैं कुँआरा था और मेरी नई-नई नौकरी भी लगी थी । मेरे मित्र जो शादीशुदा थे वे अक्‍सर मेरे यहॉं बैठ कर गप्‍पें मारते और अपनी अपनी सास पुरान सुनाते । मित्रों की बातें सुन कर मेरी आत्‍मा कॉंप उठती । कुँआरे जीवन में जो काल्‍पनिक रंगीन स्‍वप्‍नों वाली राते होनी चाहिए थीं वे इन मित्रों की वजह से भयानक स्‍वप्‍नों वाली रातों में बदलने लगी । रामसे प्रोडक्‍सशन फिल्‍म की तरह मेरे सपने भी भयानक हो गए । सपने की प्रथम दो रीलों में प्रेमिका के साथ छेड़छाड़, फिर शादी और शादी के बाद सास से मुलाकात । पहले तो मेरी सास सौम्‍य लगती परन्‍तु हॉरर फिल्‍म की तरह कुछ ही देर में उनके चेहरे पर दो दॉंत उग आते, उनका चेहरा कुरुप हो जाता और वे मुझे तरह-तरह की यातनाएं देती । यह यातना भरी स्‍वप्‍न पंद्रह रील चलती । आप समझ सकते हैं कि मेरी रातें फिर कैसे घुटन भरी हो गई । इस स्‍वप्‍न से छुटकारा पाने की मैंने बहुत कोशिश की मगर कामयाब न हो सका । आप यकीन नहीं करेंगे कि मेरी उम्र चौबीस साल से तीस साल की हो गई मगर यह स्‍वप्‍न बिना नागा किए प्रत्‍येक रात आता और जब चीख मार मैं सुबह उठता तो पसीने से अपने आप को तर पाता । शुरु-शुरु में पड़ोसी दौड़ पड़ते और मुझे तरह तरह सांत्‍वना देते । मगर मेरी चीख बाद में उन लोगों के लिए मुर्गे की बॉंग की तरह हो गई । अब मेरे पड़ोस में अलार्म घड़ी लगा कर कोई सोता, अब वे लोग मेरी चीख सुन कर उठते ।

जिसकी कल्‍पना मात्र से ही इतना डर लगता हो वह हकीकत में कितनी मुश्किल करेगी, यह सोचकर मैंने फसला कर लिया कि अब मैं शादी नहीं करुँगा । मगर हाय रे समाज ! वह कब किसी को चैन से मरने देता है । सभी मुझे सलाह देने लगे । शादी कर लो, अब नहीं करोगे तो कब करोगे । जब किसी पार्टी में जात तो सभी मित्र सपत्‍नीक होते, तो उनके लिए मैं ही आकर्षण का केंद्र होता । वह मुझे ऐसे घूरते मानो वे किसी पार्टी में नहीं वरन् किसी चिडि़याघर में मुझ जैसे निराले अविवाहित लाचार प्राणी को देखने आए हों । अपने मित्रों को अपनी-अपपनी पत्‍नी के साथ मुस्‍कराते देख मेरे दिल में कोमल भावनाओं का प्रबल आवेश आया और मैंने शादी करने का फैसला कर लिया । मगर अब शादी का एक राज़ पता चलता है कि पति-पत्‍नी के साथ खास कर पार्टियों में पति क्‍यों मुस्‍कराता रहता है, क्‍योंकि मेरी पत्‍नी किसी भी पार्टी में जाने से पहले, एक हिदायत मुझे अवश्‍य देती है देखो जी, पार्टी में मुँह लटका कर मत बैठना । खैर, तो मैंने शादी के लिए लड़की तलाशना शरु कर दिया । मगर सास का खौफ अभी भी मेरे दिलो-दिमाग में छाया हुआ था । अत: मैंने फैसला किया कि लड़की चाहे कैसी भी हो चलेगा लेकिन उसकी मॉं नहीं होनी चाहिए अर्थात् ऐसी लड़की जिसके पिता विधुरर हों । बहुत खोजबीन की परन्‍तु ऐसा कोई पुरुष न मिला हो शातिपूर्वक बिना पत्‍नी के जीवन बिता रहा हो । अलबत्‍ता ऐसी कितनी ही औरतें मिली जो बिना पति के मजे से जिंदगी बसरा कर रही थी । तब मुझे पता चला कि ससुर बिना सास का मिलना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव सा है । इधर मित्रों की पत्नियॉं मुझ पर दबाव डालने लगी कि ये क्‍या शर्त हुई, और अंत में मुझे नारी दबाव के आगे झुकना पड़ा एवं उन्‍हीं लोंगों की पसंद से मेरी शादी मेरी श्रीमती जी से हो गई । दुर्भाग्‍य से या सौभाग्‍य से कह लीजिए कि मेरी पत्‍नी की एक मात्र संबंधी उनकी मॉं ही थीं । सुनकर थोड़ा सुकून मिला कि यलो साला, साली एवं ससुर से तो छुट्टी मिली । तो साहब! धड़कते दिल से शादी के लिए घोड़ी पर बैठा और अपनी भावी सास की कल्‍पना करता रहा । फरवरी का महीना और मैं पसीने से लथपथ । सभी दोस्‍त नाच करते हुए लड़की वालों के दरवाजे पर पहँचे । पहुँचते ही मेरी सास से परिचय करावाया गया । लगा स्‍वप्‍न हकीकत बन गई, वही चेहरा । मैंने मन ही मन कहा भगवान्! अब तुम ही बचाना ।

जब विदाई की घड़ी आई तो मेरी सासु जी ने कहा बेटा जब भी तुम्‍हें मेरी जरूरत हो तो पत्र लिख देना, मैं आ जाऊँगी । मैंने मन ही मन में कहा वाह री बुढि़या । मुझे चारा डाल रही है , पर मैं कच्‍चा खिलाड़ी नहीं था । मैंने भी कहा क्‍यों नहीं मॉं जी, जरुर खत लिखूँगा । मेरी तो इच्‍छा थी कि आप भी मेरे साथ चलती लेकिन क्‍या करुँ, जहॉं मैं रहता हूँ वा मकान, एक कमरे का ही सेट है । अत: आपको बुला नहीं सकता । जैसे ही बड़े मकान की व्‍यवस्‍था हो जाएगी वैसे ही आपको बुला लूँगा । यह सुन कर उसका चेहरा थोड़ा लटक सा गया, परन्‍तु थोड़ा संभलते हुए बोली कोई बात नहीं बेटा । मुझे बुढि़या को यात्रा करने में भी बहुत तकलीफ होती है । किसी तरह से हमेशा के लिए बला टली । मैं अपनी पत्‍नी के साथ मधुर जीवन व्‍यतीत करने लगा । इसी बीच मुझे पुत्री रत्‍न की प्राप्ति भी हुई । सास ने पत्र के द्वारा अपने आने की मंशा जाहिर की ताकि नातिन का मुंह देख सके लेकिन मैंने तुरन्‍त सूचना भेज दी कि जब भी फुर्सत मिलेगी हम लोग मिलने जरुर आऍंगे ।

एक दिन मैं अपने पूर परिवार के साथ स्‍कूटर से बाजार जा रहा था कि रास्‍ते में मेरे स्‍कूटर की टक्‍कर सामने से आ रही कार से हो गई । सपरिवार हम लोग अस्‍पताल कब पहुँच गए पता ही नहीं चला । जब होश आया तो अपनी सास को अपने सामने बैठा पाया । शादी के बाद दूसरी बार अपनी सास को देख रहा था । परन्‍तु आज सासू मॉं कल्‍पना वाली नहीं थी, उनके चहने पर ममता से आत-प्रोत भाव थे । मेरी ऑंखें उनसे मिलते ही, वे फफक कर रो पड़ी और ममता भरा एक ही शब्‍द उनके मुँह से निकला- बेटा और मेरे सीने पर सर रखकर सुबकने लगी । मैं भी अपने ऑंसुओं को रोक न सका । उस स्‍नेहमयी सास की हकीकत से वाकिफ होने लगा, मन उस ममता भरी आवाज बेटा के स्‍वर लहरी में हिलोरों लेने लगा ।

हम लोग अस्‍पताल से अपने एक कमरे के सेट वाले मकान में आ गए । मेरी पत्‍नी को एक महीने का बेड रेस्‍ट था । एक महीना मेरी सास हम लोगों के साथ रहीं । उन्‍होंने हम लोगों को मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक सभी तरह से मदद की । जब मैं ऑफिस जाने लायक हुआ तो उन्‍होंने अपने घर जाने की तैयारी कर ली । मैंने उन्‍हें बहुत रोकने की कोशिश की मगर उन्‍होंने मुस्‍कराते हुए कहा बेटा, यहॉं तुम्‍हारे पास मात्र एक ही कमरा है । यह सुन कर मैं पानी-पानी हो गया ।

खैर! मेरी सासू मॉं की मधुर याद हमेशा ही आती है । पाठकों ! अब समस्‍या यह है कि स्‍वप्‍न में सास से छुटकारा पा तो लिया परन्‍तु उनकी उत्‍तराधिकारी अर्थात् मेरी पत्‍नी ने मेरे स्‍वप्‍नों में प्रवेश कर लिया । अब मेरे सपने में मेरी पत्‍नी का चेहरा ही भयानक लगता है । पहले चीखें मार कर उठ जाता था परंतु अब चीख हलक के अंदर ही रह जाती है । मैं बिस्‍तर पर छटपटाता रहता हूँ । ऑंखें तभी खुलती हैं जब मेरी धर्मपत्‍नी साक्षात् दुर्गा का रूप लिए हाथ में झाडू लेकर झकझोर कर बोलती है क्‍या बंदरों की तरह बिस्‍तर पर पलटी मार रहे हो?
तो पाठको! अपने पढ़ा कि किस तरह एक निर्मूल समस्‍या को लेकर मैं परेशान था मगर जो वास्‍तविक समस्‍या थी उसे प्रेम, प्‍यार, विश्‍वास और पता नहीं, मन में क्‍या-क्‍या सोच रहा था । मौका मिला तो मैं अपनी पत्‍नी पुराण, जो हकीकत है, उसको बयान करुँगा । आज्ञा दें ।