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Wednesday, November 4, 2015

बे-फ़िक्रे

बे-फ़िक्रे


बे-फ़िक्र हुआ “जाना”,
जब से तुम को जाना,
सजदे में रहता हूँ,
तुम को ही रब माना। 

मद-मस्त सा रहता हूँ,
तेरे ख्यालों में जीता हूँ,
तन्हाइयों में अक्सर तुझको,
अपने अन्दर ही पाता हूँ। 

न कुछ खोना है,   पाना  है,
तेरी राज़ी-ब-रज़ा में जीना है,
जब फ़िक्र करे तू मेरी,
तो बे-फ़िक्र हो, मुझे जीना है। 

न भुला हूँ, न भटका हूँ,
जब तेरे दिल में ही बसता हूँ,
तो क्यूँ फ़िक्र करूँ मैं अपनी,
बे-फ़िक्र हो कर जीता हूँ। 

जब आसमां-जमीं है तेरी,
और जब प्यार में है तू मेरी,
तो बे-फ़िक्र क्यों न हो जाऊं,
जब सारी कायनात है तेरी। 
                     - © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, October 14, 2015

आसरा

आसरा

ख़ुद से युद्ध करता रहता हूँ,
ख़ुद में राम-रावण को पाता हूँ,
जब-जब राम, रावण से हारे,
ख़ुद को दुष्कर्म में लिप्त पाता हूँ। 

दुष्कर्म में जब ख़ुद को पाता हूँ,
ख़ुद को आवरण से ढक लेता हूँ,
जब-जब रावण, राम से हारे,
सत्कर्म का मैं ढोल बजाता हूँ। 

चक्रव्युह में खुद को पाता हूँ,
अथक युद्ध मैं लड़ता रहता हूँ,
बुरे ख्याल स्वतः मुझमें आते,
सत्कर्म के लिए लड़ता रहता हूँ। 

अक्सर ख़ुद से ही हारा हूँ,
तभी तो मैं अधम-पापी हूँ.
अब तो तेरे शरण हूँ, गुरुवर !
अब तो तेरे चरण पड़ा हूँ। 

मेरे अंदर बैठा है जो रावण,
नहीं छोड़ता वह मेरा दामन,
अब आसरा है आपका गुरुवर !
आ बैठो मेरे दिल के आंगन।

नहीं कुछ है अब मेरे बस में,
बहुत दुष्कर्म किए जीवन में,
मुझ पर कृपा करो हे गुरुवर !
अजब सी बेचैनी है जीवन में। 

भौतिक-ज्ञान से केवल जीवन चला है,
आत्म-ज्ञान बिन आनन्द कहाँ मिला है,
राही” को बस अब आस थी तुमसे
उर में आनन्द का अब दीपक जला है। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, September 9, 2015

मिलन-गीत


                        मिलन -गीत

लड़का-         ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,
जब से नज़र मेरी, तुम से मिली है.
आ जा करीब आ जा,
मेरी नैनों की प्यास बुझा जा.
ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,

तेरे चहरे पे क्यूँ रुकती है मेरी नज़र,
क्यूँ रहती है तू मेरे प्यार से बे-ख़बर,
दीवाना सा लगता हूँ, दिल मेरा जले,
तू आ जा मेरी बाहों में लग जा गले,
ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,

ये रंगीन शाम, मदहोश होने लगी,
ये शाम, रात की बाहों में सोने चली,
तेरी नशीली आँखों का जाम पी लेने दे,
गुस्ताख़ी है लेकिन, इस पल को जी लेने दे,
ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,

लड़की-         जब से नज़र मेरी, तुम से मिली है,
मेरी आँखें बस अब तुम्हें ढूढ़ती है,
ये आग अब दोनों तरफ ही लगी है.
तभी तो मुलाकातें अक्सर हो रही है,

आ जा करीब आ जा,
मेरी नैनों की प्यास बुझा जा.

दोनों-            ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,
जब से नज़र मेरी, तुम से मिली है.
आ जा करीब आ जा,
मेरी नैनों की प्यास बुझा जा.
ये सासें, ये धड़कन, थम सी गई है,

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Thursday, August 27, 2015

बैरी सावन











    बैरी सावन


सावन में सिमटी रहती हूँ,
सावन में गुमसुम रहती हूँ। 

जब से गए है परदेश सजनवा,
उनसे मिलने की सपने बुनती हूँ। 

जब बारिश आग लगाती सावन में,
आँगन में भीग, चुपचाप रो लेती हूँ। 

जब भी उनसे हो फोन पर बातें,
दिल की बातें नहीं कह पाती हूँ। 

भरा-पूरा है घर-आँगन मेरा फिर भी,
जल बिन मछली जैसी तड़प रही हूँ। 

जब से खबर मिली है उनके आने की
न चाहते हुए भी मैं थोड़ी-सी बदल गई हूँ। 

"राही”, जाने-अनजाने हो जाती है गलती मुझसे
देवर, सास और ननद की ताने सुनती रहती हूँ। 

सावन में सिमटी रहती हूँ,

सावन में गुमसुम रहती हूँ। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Tuesday, August 11, 2015

AE DIL HAI MUSHKIL

चित्र http://aedilhaimushkil.com/   से साभार 











(FILM KE TITLE PAR GEET LIKHANE KI KOSHISH KI HAI.)

ऐ दिल है मुश्किल


ऐ दिल है मुश्किल,
वो कहती है आ गले मिल.
मगर तू धड़कता है किसी और के लिए,
जो तेरे साँसों में है शामिल।

उसकी कशिश में है फंसा तू,
कितना समझाऊ तुझे, न समझे तू,
शोख चंचल अदा उसकी गजब है,
उसे भी नहीं चाहता छोड़ना तू। 

दोनों चाहती है तुझे दिलों-जां से,
इसलिए रहते हो तुम परेशां से,
मगर दोनों को कुछ बोला, भेद राजे-दिल का खोला,
तो गिर जाओगे दोनों की नज़र से। 

 दिल है मुश्किल,
तेरा जीना हुआ बोझिल,
तुझे राहत तभी मिलेगी,
जब दूसरी न हो मेरे दिल

 दिल है मुश्किल,
जरा संभल जा  मेरे दिल,
ये कहना बड़ा आसां है,
तेरी राह में है बड़ी मुश्किल.

अब कुदरत करेगा कोई उपाय.
जो तुझे इस मुश्किल से बचाए,
तेरे हाथ अब कुछ भी नहीं है,
तो फिर क्यूँ तू यूँ ही घबड़ाए.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, July 22, 2015

आवारा आशिक



आवारा आशिक

समेट लो दामन में मुझको, मैं बिखड़ा हुआ हूँ,

सहारा मुझको दे दो तुम, अंदर से टुटा हुआ हूँ.


बे-वजह तुम से मिला और मेरा ये हाल हुआ,

पहले आवारा बादल सा, मैं जीवन जीता रहा हूँ.


मुझे देख कर दहशत में जीते थे लोग,

अब उन्हीं के ठोकरों पर, मैं जी रहा हूँ.


बहुत ही कठिन है शराफ़त से जीना,

तेरी सोहबत के ख़ातिर, मैं ये कोशिश कर रहा हूँ.


मुफ़लिसी में जीना कोई मुश्किल नहीं है,

बेबसी में जीना है कैसा, मैं अब समझ रहा हूँ.


हौसलों के आगे असफलता कब तक टिकेगी,

जैसा चाहा था उसने वैसा, मैं अब बन गया हूँ.


कुछ भी बन जाना ये मेरे हाथ में है “राही”

वो मेरी बनेगी एक दिन, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



Wednesday, May 27, 2015

नई पीढ़ी








       नई पीढ़ी


रुको! सुन लो मेरी बात,
मैं जानता हूँ कि तुम नहीं मानोगे,
सुन लोगे मेरी बात बुजुर्ग मानकर,
लेकिन करोगे अपनी मन-मर्जी,
और पछताओगे समय निकल जाने पर,
जैसे, आज मैं सोचता हूँ,
क्यों नहीं मैंने मानी,
अपने बुजुर्गों की बात!

मैं मानता हूँ पीढ़ी के फासले को,
और मानता हूँ हमदोनों के सोचने के अंतर को,
पर शाश्वत सत्य कभी बदलते हैं भला,
जीवन शैली हमदोनों की जुदा हो सकती है,
मगर सफलता के सूत्र भी कभी बदलते हैं भला,
और छल-कपट से कभी सफल हो भी जाओ,
तो क्या तुम कभी बदल पाओगे,
समाज के घिनौने चेहरों को,

ऐसा नहीं है कि मैंने सफलता प्राप्त नहीं की,
और ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें सफलता नहीं मिलेगी,
फर्क है तो बस मापदंड का,
जी रहा होता और खुशहाल ज़िन्दगी,
अगर मैंने मानी होती,
अपने बुजुर्गों की बात!

इसलिए सुन लो मेरी बात,
युवा हो तुम ! है तुम में अनंत ऊर्जा,
हो जाओ तुम उश्रृंखल,
केवल मौज-मस्ती के लिए,
पर ध्यान रहे!
उससे अहित न हो दूसरों का,
शेष ऊर्जा को खर्च करो दिल खोल कर,
जो काम आए अपने और समाज के नव-निर्माण में,
मैं नहीं कहता कि तुम सभी भटके हुए हो,
मेरी सलाह उनके लिए जो युवा है आम,
रुको! सुन लो मेरी बात.
जिनसे मैं भी सीखता हूँ,
ऐसे युवाओं को पहुंचाना मेरा भी सलाम!

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"








Tuesday, May 19, 2015

Simran Simmi Bhajan - 01



मेरी बड़ी दीदी द्वारा रचित एवं स्वरबद्ध किया और और छोटी बहन द्वारा गाया ये भजन संग्रह पसंद आये या इसे खरीदना चाहे तो सूचित अवश्य करें.- आपका राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, May 13, 2015

विरह वेदना











      विरह वेदना



ज़िन्दगी में ये कैसा मोड़ आया,
जो सबसे प्यारा था उसे छोड़ आया.

वो प्यारा था, ये तब मैंने जाना,
जब उसे उस मोड़ पर छोड़ आया.

आँखों में समुन्दर, सीने में बवंडर,
रख सीने पर पत्थर, उसे छोड़ आया.

न मैंने कुछ कहा, न कुछ उसने कहा,
मीठी यादों के सहारे, उसे छोड़ आया.

जीवन कब रुका है जो अब रुकेगा,
मगर अपना सब कुछ वहीँ छोड़ आया.

न मिलेंगे कभी, ऐसा है तो नहीं,
फिर भी गम है कि उसे छोड़ आया.

करेगा नाम रौशन मेरा, इसी आस पर,
कामयाबी की राह पर “राही”, उसे छोड़ आया.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, April 15, 2015

घायल मन



घायल मन


जख्म छुपा कर रखना अपने सीने में,
जख्म कुरेदने वाले हजारों है इस जमाने में.

बेवजह कोई किसी से बात नहीं करता यहाँ,
बहुत तकलीफ़ होती है जुबाँ बंद रखने में.

इस अजनबी शहर में, रोने को कंधा नहीं मिलता,
ग़मों का पहाड़ टूटा है मगर आँसू नहीं है आँखों में.

यह शाश्वत सत्य है कि पैसों से खुशियाँ नहीं मिलती,
फिर क्यूँ लोग उम्र खपाते है पैसा कमाने में.

झूठी शान-शौकत में लोग कुछ ऐसे अकड़े हैं,
बहुत मशक्कत करनी पड़ती है मुस्कुराने में.

कोई रिश्ता नहीं बचा जो स्वार्थी न हो,
ठगा हुआ महसूस करता हूँ रिश्ता निभाने में.

इस शहर में भीड़ बहुत है फिर भी तन्हा हूँ,
सच कहता हूँ “राही” अब मजा नहीं है जीने में.

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, March 25, 2015

कशिश

कशिश 

न जाने वो कशिश कैसे कम हो गई,
जिंदगी मेरी जैसे ठहर सी गई। 

मैं भी हूँ वही, तुम भी हो वही,
बस उम्र ही हाथों से फिसल सी गई। 

न शिकवा मैंने किया, न शिकायत तुमने किया,
बस हम दोनों के बीच गुफ्तगू बंद हो गई। 

जीवन के जंजाल में तुम इस कदर खो गए,
छोटी-छोटी खुशियाँ जैसे बिसर सी गई। 

मैंने माना कि सब करते हो मेरी खातिर ही तुम,
पर सहमति ही मेरी अनदेखी रह गई। 

मेरे होठों पर हँसी, तेरे चहरे पर खुशी,
बस यही माँगा था मगर किस्मत दगा दे गई। 

एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं हम,
पर मोहब्बत ही एक-दूसरे के लिए कम हो गई। 

ऐशो-आराम की सभी चीजें बेकार हैं,
एक-दूसरे के लिए ही चाहत जब कम हो गई। 

मुद्दतों के बाद “राही” तुमने, प्यार से देखा मुझे,
अब मिला है सुकून मगर साँसें थम सी गई। 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


Top 10 Poetry Blog Posts of last Month:-by baggout.com/blog

 9. Rakesh ki Rachanay

In this country, it is often seen that for the happiness of our parents and respect in society we often take steps which may not give us the joy that we deserve. People sacrifice their lives for their ‘name’ in the society and keep on leading an unhappy life. To marry the ‘perfect’ groom who is approved by the society, we sometimes leave behind the perfect person who loves us unconditionally. This poem ‘Kasak’ is about that lover who has lost his love to another and now has to watch his love suffer while he himself has to stand outside observing everything because without the permission of his love he is not able to do anything and his hands are tied.