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Friday, March 31, 2017

वाक्यांश – भूत


वाक्यांश – भूत   

दीनानाथ जी की बहू को आए दिन भूत चढ़ जाता, जिसके कारण दीनानाथ एवं उनकी पत्नी बहुत परेशान रहते। बहुत टोना-टोटका करवाया, पीर-फक़ीर और दरगाह के गंडे-ताबीज़ भी बहू के गले एवं बाजुओं में बंधवाये, परन्तु बहू की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। थक हार कर दीनानाथ जी दुसरे गाँव के ओझा के पास अपने बहू को ले कर गए। 

ओझा ने दीनानाथ जी को कहा – “बहू का भूत झाड़ कर आता हूँ तब तक आप बाहर बैठिए।”

ओझा जी ने बंद कमरे में बहू से पूछा – “सच-सच बताओ! क्या बात है? मैं तुम्हारे गाँव का भी नहीं हूँ और ना ही मैं तुम्हारे गाँव के किसी व्यक्ति को जानता हूँ।”

इतना सुनकर बहू आश्वस्त हो कर बोली – “ओझा जी ! मेरा परिवार बड़ा है और घर में सास, ननद और जेठानियाँ है पर काम में कोई हाथ नहीं बटाता है।”

इतना सुनकर ओझा जी बाहर आकर दीनानाथ जी को कहा – “दीनानाथ जी आपकी बहू का भूत उतार दिया है, बस ख्याल रखें कि बहू, आग एवं पानी में ज्यादा समय ना बिताएं। 

अब दीनानाथ जी के यहाँ खुशहाली है क्योंकि उनके घर की सारी औरतें मिल-जुल कर काम करती हैं। 

पढ़िए मेरी एक कहानी वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु" 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Wednesday, March 29, 2017

वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु"



वाक्यांश – "इच्छा-मृत्यु"


एक दिन सुबह, जब मैं सैर करने निकला तो एक लड़की ने अटकते हुए आवाज़ दी – “अंकल जी !

मैं उस अनजान, पतली-दुबली और जिसकी उम्र करीब चौदह-पंद्रह साल होगी, लड़की की तरफ मुखातिब होते हुए बोला – “क्या बात है?”

देखने में गरीब परिवार की लग रही थी और डरी हुई भी थी। 

उसने, अपने गले को साफ़ कर, ऊँगली से इशारा कर के बोली – “ वो मुझे कुत्तों से डर लगता है।”

मेरी नज़र उसके इशारे की तरफ मुड़ी । मुझे सुनसान सड़क के किनारे कुछ दूरी पर तीन-चार आवारा कुत्ते दिखे और मैं उसके साथ कुछ दूर चला। जब उसे लगा की कुत्तों से अब कोई खतरा नहीं है तो वह दौड़ कर पास के एक मकान में चली गई। 

तब से अक्सर वो लड़की मुझे वहीँ मिल जाती थी। बात-चीत से पता चला कि उसका नाम सरला है और वो उस घर में नौकरानी का काम करती है। 

एक दिन जब मैं सैर करने उसी रास्ते से जा रहा था तो वहाँ कुछ लोग इक्कठे खड़े थे। मैं उनमें से एक को जानता था। 

मैंने कहा – “शर्मा जी ! आज सुबह-सुबह यहाँ आप लोग इक्कठे क्यूँ हैं, सब खैरियत तो है। 

तब शर्मा जी ने कहा – “ श्रीवास्तव जी ! क्या बताएं, घोर कलयुग आ गया है। मिश्रा जी के यहाँ सरला नाम की बच्ची घर का काम करने आती थी। कल सुबह कुछ दरिंदों ने उसकी इज्ज़त लूटी और जख्मी कर अर्द्ध-नग्न अवस्था में इस सड़क के किनारे छोड़ कर भाग गए।”

मुझे यह सुनकर बहुत दुःख हुआ और साथ में अफ़सोस भी कि कल मैं सैर करने क्यों नहीं आया था। मुझे शर्मा जी से ही पता चला की सरला का ईलाज सिविल अस्पताल में चल रहा है। मैं भागता हुआ उसके पास पहुँचा। 

मुझे देख कर उसने बिलखते हुए कहा – “ अंकल जी ! आप मुझे कल सुबह क्यों नहीं मिले। जब वे कुत्ते मुझ पर झपटे तो मुझे आपकी बहुत याद आ रही थी और जब वह दरिंदे मुझे अर्द्धचेतन अवस्था में छोड़ कर भाग गए तो मेरे मन में इच्छा-मृत्यु की कामना उठ रही थी कि काश सच में गली के कुत्तें कल मुझे नोच खाते तो कितना अच्छा होता।”

उसकी बातों को सुनने के बाद मेरी आँखों में आँसू आ गए पर उसको देने के लिए मेरे पास सांत्वना के शब्द भी नहीं थे। 

चित्र  http://www.dnaindia.com/ से साभार

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"





Friday, March 24, 2017

Photography Bird - 1 (फोटोग्राफी - पक्षी-1)

Photography: (dated 19 03 2017 12: 30  AM )

Place : Kapurthala, Punjab, India

Red-wattled lapwing




A famous bird in the category of red-wattled lapwing.


I am not an ornithologist, but I do not know why whenever I see a bird, I am ready to take photographs. It was ready to go for a ride on Sunday. There was also a camera in hand. Only then did the Sharif bird be imprisoned in my camera or if the bird came to hand.

टिट्टिभ(टिटिहरी)(Red-wattled lapwing )वर्ग का एक प्रसिद्ध पक्षी।


मैं कोई पक्षी विज्ञानी नहीं हूँ, परंतु पता नहीं क्यूँ मैं जब भी कोई पक्षी देखता हूँ तो उसकी तस्वीर लेने को मचल उठता हूँ। रविवार को भ्रमण हेतु जाने को तैयार था हाथ में कैमरा भी था तभी ये शरीफ़ पक्षी मेरे कैमरे में कैद हो गया नहीं तो पक्षी कहाँ हाथ आते है। 

 (अन्य भाषा में नाम का स्रोत - http://birds.thenatureweb.net/):-


Assamese: বালিঘোৰা, Bengali: হটটিটি, Gujarati: ટીટોડી, Hindi: टिटहरी, Kannada: ಕೆಂ ಟಿಟ್ಟಿಭ, Malayalam: ചെങ്കണ്ണി തിത്തിരി, Marathi: टिटवी, ताम्रमुखी टिटवी, Nepali: हुटिट्याउँ, Sanskrit: ताम्रमुखी टिट्टिभ, Tamil: சிவப்பு மூக்கு ஆள்காட்டி







- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"







Wednesday, March 22, 2017

खुशी का मन्त्र

















खुशी का मन्त्र 

खुशियाँ फैली यहाँ चारो ओर,
फिर मन क्यों भागे दुःख की ओर,
जीवन जीने का मज़ा तब आएगा
जब मन देखेगा खुशी की ओर। 

मन में दुख है बस एक कारण से,
पर खुशी मिल सकती हज़ारों से,
तो फिर मत सोचो एक कारण को 
ख़ुशी ले लो! चाहने वालों से। 

खिड़की खोल प्रकृति को देखो,
फूल, पेड़ और पक्षी को देखो,
खुशियों से चेहरा खिल जाएगा
रोते हुए को हँसा कर देखो। 

छोड़ो, जाने दो, को मानो तुम, 
निराशा का साथ भी छोड़ो तुम,
दुःख दे, उनके बारे में मत सोचो
खुशियाँ दे, उसके साथ चलो तुम। 

आस, अपेक्षा ही दुःख देता  है,
जो चाहा, नहीं सदा मिलता है,
खुश रहना है तो खुद को बदलो
सभी बदलें, ये नहीं होता है।

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"




Wednesday, March 15, 2017

भरोसा

("अत्यधिक  भरोसा  खतरे  को  जन्म  देता  है।")

    



         

     

      भरोसा

असहिष्णु शब्द का मर्म खूब जानते हैं वे। 
देश कैसे बंटे? ये खूब जानते हैं वे। 

जब से मैंने ये लिख दिया है अख़बारों में,
मुझको ज़िन्दा देखना नहीं चाहते हैं वे।

तथा-कथित देशभक्त भी जानने लगे मुझे,
उनके मुताबिक़ मैं लिखूँ ये चाहते हैं वे। 

अपना दल बनाकर राजा बन बैठें है जो 
गणतंत्र में राज चलाना जानते हैं वे। 

उम्र भर उनको शासन करते हुए देखा है,
अब वंश करेगा शासन ये जानते हैं वे। 

वोटर बेचारे क्या करें किस दल को चुने,
कुछ नहीं बदलनेवाला ये जानते है वे। 

जो तमाम उम्र नहीं की माँ-बाप की सेवा,
उनके चित्रों से घर सजाना जानते है वे।

आज हाथ जोड़े नेता खड़ा है जो "राही",
कल सर झुकेगा सभी का, ये जानते है वे।


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"






Friday, March 10, 2017

हुसैनीवाला बॉर्डर, फिरोज़पुर

हुसैनीवाला बॉर्डर, फिरोज़पुर 

रिट्रीट समारोह को मैंने पहली बार बाघा बार्डर पर देखा था। क्या माहौल था ? सूर्यास्त से पहले वहाँ उपस्थित सभी भारतीय आम नागरिक एवं सैनिक के दिलों में देश-भक्ति का जज़्बा भरा हुआ  था और ये जज़्बा अपने चरम पर तब पहुँच गया जब भारत माता की जय-घोष का कमान माइक द्वारा एक सैनिक ने संभाली। उस सैनिक उद्घोषक के जोश पूर्ण आह्वान एवं उसके खास भाव-भंगिमा के साथ उद्घोष ने वहाँ उपस्थित जवानों, बुजुर्गों, महिलाओं एवं बच्चों में देशप्रेम की भावना रग-रग में भर दिया . वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों के “भारत माता की जय” की उद्घोष के कारण वहाँ के फ़िजाओं में राष्ट्र-प्रेम की स्वर-लहरी गूंज रही थी, परन्तु अब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिलने से बाघा बॉर्डर पर भारी भीड़ रहती है। जिसके कारण दर्शक दीर्घा  बड़ा कर दिया गया है। दर्शक दीर्घा बड़ा होने के कारण बहुत से लोगों को रिट्रीट समारोह ठीक से नहीं दिखता और खास कर बुजुर्गों, महिलाओं एवं बच्चों को परेशानी होती है।  

जब मैंने इस परेशानी की चर्चा अपने मित्रों से की, तो एक मित्र ने मुझे हुसैनीवाला बॉर्डर, फिरोज़पुर के बारे में बताया कि यहाँ पर भी रिट्रीट समारोह होता है, तो मैंने अपने कुछ मित्रों के साथ वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाया।  फिरोज़पुर कैंट रेलवे स्टेशन  से लगभग 12 कि.मी. दुरी पर है हुसैनीवाला बॉर्डर। 

हमलोग ट्रेन से सुबह 11:30 बजे फिरोज़पुर कैंट पहुँच गए और खाना खा कर स्टेशन के बाहर से कार भाड़े पर लेकर, सबसे पहले हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीदी स्मारक स्थल पहुँचे।  यह स्मारक पाकिस्तान से लगने वाली सीमा से मात्र एक किलोमीटर पर है। यहाँ पर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का समाधि स्थल है।


दरअसल देश के विभाजन के वक्त यह अंत्येष्टि स्थल पाकिस्तान में चला गया था और यह स्थल सन् 1962 के पहले तक पाकिस्तान के अधीन था, परन्तु पकिस्तान सरकार ने भारत के इन महान शहीदों, जो दोनों देशों के आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया, की स्मृति स्थल को सहेजने तक की परवाह नहीं की। तब 1962 में भारत सरकार के पहल पर, जब भारत ने पाकिस्तान को हेड सुलेमानकी (फाजिल्का) के पास 12 गांवों को दे दी तब यह क्षेत्र  भारत के अधीन हुआ।  यहाँ 23 मार्च, 1968 को शहीदी समाधी स्थल बना । लेकिन भाग्य की विडंबना है कि सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान सेना ने शहीदों की प्रतिमाओं को अपने कब्जे में ले लिया और आज तक वापस नहीं किया है। देश के पूर्व राष्ट्रपति एवं पंजाब के तत्कालीन सीएम ज्ञानी जैल सिंह ने 1973 में इस स्मारक को फिर से विकसित करवाया। यहाँ पर   बटुकेश्वर दत्त एवं भगत सिंह की माँ विद्यावती का अन्तिम संस्कार भी  किया गया। 

शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जी को 23 मार्च 1931 को शाम 7:15  लाहौर जेल में फांसी दी गई। लाहौर में दंगा ना भड़क जाए, इसलिए अंग्रेजों ने जेल का पिछला दीवार तोड़ कर ट्रेन द्वारा हुसैनीवाला लाकर अंतिम संस्कार कर ही रहे थे, तभी आज़ादी के परवानों के पहुँचने की खबर एवं उनके इंक़लाबी शोर को सुन कर,  डर के मारे अंग्रेजों ने अधजला शव को वहाँ से उठा कर सतलज नदी में प्रवाहित कर दिया। भारत -पाक युद्ध के दौरान यह स्थल बुरी तरह से नष्ट हो गया, परन्तु रेलवे के कुछ अवशेष अभी भी यहाँ मौजूद है। इस पावन धरती को चूम कर मैं धन्य हो रहा था। 

यहाँ से लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर हुसैनीवाला बॉर्डर का प्रवेश द्वार शान-ए-हिन्द है जो 42 फुट लम्बा एवं 91 फुट चौड़ा और 56 फुट ऊँचा है। यह पकिस्तान के बनाए 30 फुट ऊँचे फ़ख्र-ए-पाक के जवाब में बनाया गया हैं। हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीदी स्मारक से हुसैनीवाला बॉर्डर तक पैदल चलना पड़ता है।

शान-ए-हिन्द

जैसा की मैंने पहले बाघा बॉर्डर का विवरण दिया उसके उलट यहाँ के फ़िजाओं में देश-भक्ति के गीत तो गूंज रहे थे, परन्तु माहौल बहुत शांतिपूर्ण था। दोस्ताना माहौल में कदम-ताल एवं झंडा उतारने का लगभग 40 मिनट का समारोह संपन्न हुआ। हिन्दुस्तान एवं पाकिस्तान का दर्शक-दीर्घा आमने-सामने है और दोनों के बीच मात्र एक सड़क है जिस पर रिट्रीट समारोह होता है। इतने नजदीक से पाकिस्तानियों के सामने बैठ कर रिट्रीट समारोह देखने का अनुभव अनोखा था। ज्यादातर दर्शक स्थानीय ग्रामीण परिवेश के थे। फिरोज़पुर से हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीदी स्मारक तक के सड़क की हालत खास्ता होने एवं व्यापक प्रचार ना होने के कारण पर्यटकों की संख्या नगण्य थी, परन्तु देश-भक्ति की जज़्बा इस धरती पर कदम पड़ते ही स्वतः दिल में उमड़ पड़ती है।

देखें कुछ और तस्वीर :



यहाँ पहले रेलवे ट्रैक था। 
 यहाँ पहले रेलवे पुल  था। 








फिरोज़पुर रेलवे स्टेशन के पास स्टीम रोड रोलर 

फिरोज़पुर रेलवे प्लेटफार्म का नज़ारा 

- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"

Wednesday, March 8, 2017

पत्नी पुराण

पाठकों ! मेरी पहली कहानी सास पुराण आप सभी ने पढ़ी और सराही जिसके लिए आप सबको मेरी तरफ से धन्यवाद। साथियों! आप सब बार-बार मुझसे अनुरोध करते रहे कि सास-पुराण के बाद पत्नी-पुराण भी लिखूँ। पत्नी-पुराण की पाण्डुलिपि तो मैंने आपके कहने पर तैयार कर ली थी, परन्तु किसी पति में इतना साहस तो है कि वह अपनी पत्नी के बारे में कुछ लिख ले  और उस कृति को नजरबंद कर  दे, किन्तु  उसे  प्रकाशित कर दे, इतनी हिम्मत कहाँ? पति तो बेचारा एक निरीह प्राणी है, जो शादी के बाद घर में केवल सुनता है, बोलता कुछ नहीं है। इसलिए आप सभी, पतियों को घर  के बाहर, बहस करते, डींगे मारते, बिन पूछे राय देते तो देखा  ही होगा और ऐसे पतियों को भी देखा  होगा, जो राह चलते बड़बड़ाते भी हैं। आप सब से अनुरोध है कि ऐसे व्यक्ति को आपकी सहानभूति की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु जरा संभल  के, हो सकता  है कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक न हो और आप से  ही उलझ पड़े। तो आइए, फिर से बजरंग बली  का नाम लेते हुए मैं अपना पत्नी पुराण शुरू करता हूँ। मेरी शादी किस तरह से हुई यह तो आपने सास पुराण में तो पढ़ ही लिया।
सास पुराण पढने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें :-
http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2012/02/blog-post.html


अब आगे .........

मेरी पत्नी बहुत सुंदर एवं सुशील थी और वाणी मधुर जैसे की प्रत्येक पति को लगता है। मेरी पत्नी का व्यवहार शुरू में तो सभी के साथ मधुर था, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया उसने अपना पहला निशाना मेरी माँ को बनाया, फिर क्या था? मेरा घर युद्ध के मैदान में बदल गया। एक तरफ मेरी माँ एवं मेरे भाई-बहन तो दूसरी तरफ मेरी पत्नी।

मेरी सरकारी नौकरी का कार्यस्थल घर से दूर था और साल में दो ही बार घर जा पाता था। शादी के शुरूआती दिनों में तो घर जाने के नाम पर रौनक आ जाती थी, क्यूंकि घर पहुँचते ही माँ, बहू का गुणगान करती और उनकी बहू मेरी सेवा! फिर क्या था? दोनों हाथो में लड्डू अर्थात शादी का लड्डू जिसे खा कर मैं बहुत खुश था। इन्हीं खुशियों के बीच मुझे एक पुत्री-रत्न प्राप्ति की ख़ुशी मिली।

मेरी माँ भी बहुत खुश थी और हो भी क्यों ना, किसी को पराधीन रखने का जो असीम सुख स्त्रियों को मिलता है, वह सभी सुखों में सर्वोपरी है। यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सास-बहुओं के बीच ताल-मेल कभी बैठ नहीं पाता। सामान्यतः सास अपनी बहू को पराधीन रखती है, परन्तु कहीं-कहीं स्थिति विपरीत भी हो जाती है अर्थात बहू दबंग हो तो सास को पराधीन बना लेती है। खैर ! साधारणतः जब किसी स्त्री के बेटे की शादी होती है तो बहू को बेटी बनाने का सपना देखती है, परन्तु वह उसे अपने अनुशासन में रखना चाहती है। पर क्या किसी की बेटी, किसी के अनुशासन में रह सकती है? अरे ! बेटी तो लक्ष्मी होती है और लक्ष्मी तो चंचल होती है, लक्ष्मी किसी के अधीन नहीं रह सकती, वो तो उसी के पास रहेगी, जो उसको सर पर चढ़ा कर रखेगा। इसलिए स्त्री या तो पिता के साथ ख़ुशी से रहती है या पति के साथ।

तो, जब तक मेरी पत्नी को मेरे घर वालों ने सर चढ़ा कर रखा तब तक तो सब ठीक था , परन्तु जैसे-जैसे अनुशासन में रखने के लिए टोका-टाकी शुरू हुई, वैसे ही सास-बहू का तालमेल  बिगड़ा और मेरे शादी के लड्डू खा कर पछताने के दिन शुरू हो गए। अब मुझे घर जाने की ख़ुशी नहीं रहती, बल्कि घर जाने के नाम से ही पसीने आ जाते।किसी तरह घर पहुंचता, तो माँ अपने बहू की करतूतों से दिनभर अवगत कराती और रात  को खाना खाकर सोने जाता तो पत्नी रातभर अपनी सफाई देने में बिता देती। मैं तो बेचारा उल्लू की भाँति ऑंखें गोल-गोल घुमाकर दोनों की बातें सुनता रहता।

जब आपके अपनों के बीच युद्ध हो, तो आप तटस्थ नहीं रह सकते और अगर मैं  केवल किसी एक के पक्ष में दलील देता तो यकीन मानिए या तो मेरा  सारा दिन ख़राब होता या सारी रात। तो,  मैं यह खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। अतः दोनों की बातों में हाँ-में-हाँ मिलाने लगा। पर मैं जानता था कि यह कोई स्थाई समाधान नहीं है। इसी उधेड़-बुन में मैंने बीमारी का बहाना बना कर घर आना-जाना बंद कर दिया। लेकिन क्या परिस्थितियों से निपटने के लिए पलायनवादी सोच कभी काम आती है, जो मेरे काम आती। अतः ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मैंने पत्नी को समझाने से अच्छा, माँ को ही समझाना अच्छा समझा और हिम्मत करके घर गया। घर पहुँचते ही माँ ने मेरी तबियत के बारे में पूछा।

मैंने माँ से कहा – माँ! तबियत तो अब ठीक है परन्तु कमजोरी महसूस करता हूँ। बाहर का खाना खाने का मन नहीं करता।

माँ ने कहा – तो बहु को ले जा। मैं तो तुम्हारे भाई-बहन की पढ़ाई एवं पिता जी की नौकरी के कारण, तुम्हारे साथ जा नहीं सकती। 

इतना सुनते ही, मेरी बिन माँगे मुराद पूरी हो गई। मैं अपनी पत्नी को अपने साथ ले आया। पत्नी जी अपने नई गृहस्थी को संभालने में लग गई और मेरी माता जी अपने छोटी बहू को ढूढ़ने में। अब मेरे दोनों हाथों में लड्डू और सर कड़ाही में था। उधर माँ अपनी छोटी बहु के लिए योग्य लड़की की बातें मुझको बता कर खुश होती और इधर मेरी पत्नी अपने स्वयं की  गृहस्थी को सजाने एवं नई सहेलियाँ बनाने में खुश थी। मैं भी उसकी सेवा एवं ख़ुशी को देख निहाल हो रहा था, परन्तु यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। शुरू में तो बैंक में रखे पैसों से गृहस्थी चली, परन्तु मुझे लगने लगा कि मासिक वेतन से घर खर्च चलाना मुश्किल है, तो इस पर मैंने पत्नी को टोकना शुरू किया, जैसे ही मैंने अपनी पत्नी को टोकना शुरू किया, वो तो नागिन की तरह फुफकारने लगी और कहने लगी – देखो जी ! मुझे इस तरह की टोका-टाकी पसंद नहीं है, क्या मैंने गहने गढ़वा लिए? जो खर्च हो रहा है, वह केवल राशन पर ही हो रहा है। ना मैंने अपने मायके में खाने-पीने में कटौती देखी है और ना ही मुझसे खाने-पीने के समान में कटौती  होती है।

ये सिलसिला जो चला वो कभी रुका ही नहीं। मैं इन सब से बचने के लिए ऑफिस से आता और चुपचाप अपने साहित्यिक लेखन में जुट जाता परन्तु उसे मेरा यह पलायनवादी तरीका पसंद नहीं आया। कुछ दिन तू-तू-मैं-मैं होती रही और अंत में मुझे ही उसकी  हाँ में हाँ मिलाकर अपना हथियार डालना पड़ा और मैंने लाफिंग बुद्धा का शांति वाला चोंगा पहन लिया। आए दिन किसी न किसी बात पर मुझको लड़ने के लिए उकसाती परन्तु मैंने अपनी शांति का चोंगा नहीं उतारा।

ऐसे तो मैं लड़के और लड़की में भेद नहीं करता परन्तु लड़का ना होने की कसक इस प्रौढ़ा अवस्था में ज्यादा महसूस हो रही थी। क्योंकि मेरे जिन मित्रों के पुत्र थे, वे अब आनंद में थे। क्योंकि उनकी पत्नियों को अपने-अपने  बहू और बेटों से फुर्सत नहीं थी, जो अपने पति पर चिल्लाये। मैं इस उम्र में भी अपनी पत्नी से प्रताड़ित होता रहा। पहले मैं काल्पनिक सास के डर से नींद में चिल्लाता था, अब स्वप्न में पत्नी श्री के भय से, नींद में भी चीख नहीं निकल पाती। मैं बिस्तर पर छटपटाता रहता हूँ । ऑंखें तभी खुलती हैं जब मेरी धर्मपत्नी साक्षात् दुर्गा का रूप लिए हाथ में झाड़ू लेकर झकझोर कर बोलती है – क्या बंदरों की तरह बिस्तर पर पलटी मार रहे हो?

खैर ! समय बीतता गया और बेटी की शादी के लिए मेरी दौड़-भाग शुरू हो गई। लड़की की शादी एक अच्छे परिवार में तय हो गई। शादी की तैयारी शुरू करनी थी, तभी मेरे दोनों हाथों और पैरों में लकवा मार गया और मैं व्हील चेयर पर आ गया। बेटी की शादी उसने, अपने बचत किए हुए रुपयों एवं गहनों को बेच कर की। मेरी नौकरी चली गई परन्तु अनुकम्पा के आधार पर मेरी पत्नी को नौकरी मिल गई। सदा चहकने वाली स्त्री, अब कर्तव्यों के बोझ तले गंभीर हो गई। मुझसे सदा लड़ने को उत्सुक, अब मेरी सेवा में तल्लीन हो गई। अब वह दफ्तर के काम के साथ-साथ घर की सारी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली और मेरी शारीरिक सेवा को उसने पूजा और आराधना का रूप दे दिया।  उसने बड़े ही संयम से अपने सभी कार्यों को अंजाम दिया।

मैंने अक्सर देखा है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्रियों की दिनचर्या अन्य स्त्रियों की तुलना में बहुत ही कठिन होती है। जहाँ मुश्किल घड़ी में पुरुष धैर्य खो देता है वहीँ स्त्रियाँ दुर्गा बन परिस्थितियों का सामना करती हैं।

मेरी बेबसी के आसुंओं को देख, वह अक्सर मुझे सांत्वना देती - " देखना! तुम एक दिन चलने-फिरने लगोगे, तो फिर, मैं तुम से झगड़ा करुँगी।"

एक दिन मैंने उससे पूछ लिया – "तो क्या तुमको मुझसे हमेशा झगड़ना ही है ?"

उसने कहा – “हाँ! झगड़ना है, आखिर मैं भी एक इंसान हूँ। मुझे तुम्हारी किसी बात पर गुस्सा आ जाए तो तुमसे लड़ाई ना करूँ तो किससे करूँ। तुम तो जानते ही हो कि स्त्रियों को ता-उम्र  कितनी टोका-टाकी होती है , पर अपने आक्रोश को स्त्री कहाँ प्रकट करें। अगर कोई प्यार करने वाला पति उसे मिले, तो कभी-कभी अपने दबे हुए आक्रोश को अपने पति पर निकाल भी ले, तो क्या यह गुनाह है? आखिर वहीँ स्त्री अपने पति को सदैव प्यार करती है तो वह पुरुष को दिखाई नहीं देता, परन्तु कभी-कभी के झगड़ों को माफ़ करने की जगह, पुरुष सदैव के लिए उसे दिल में रख कर मौन धारण कर ले और पत्नी के प्यार को ना समझे तो इसमें स्त्रियों का क्या दोष?”

आज यह शब्द हथौड़े की तरह मस्तिष्क में गूंज रहें हैं। मैंने कितने ख़ुशी के स्वर्णिम अवसर खो दिए। मैं आज बहुत दिनों के बाद अपनी पत्नी श्री की तस्वीर के सामने बैठा, पत्नी पुराण  पाण्डुलिपि  को पढ़ रहा हूँ। उनकी अथक मेहनत और विश्वास से मैं स्वस्थ हो गया परन्तु मेरे देखभाल के चक्कर में वो अपनी स्वास्थ का ख्याल नहीं रख सकीं  और समय से पहले ही और मेरे ठीक होने के बाद उनका निधन हो गया।


"हेलमेट और पत्नी दोनों का स्वभाव एक जैसा है... सिर पर बिठा कर रखो तो जान बची रहेगी।
पतियों को समर्पित।"


- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"


            

Friday, March 3, 2017

रॉक गार्डन, चंडीगढ़ की सैर

रॉक गार्डन, चंडीगढ़ की सैर

छतबीर चिड़ियाघर सैर के बाद रॉक गार्डन, चंडीगढ़ की सैर  :

छतबीर चिड़ियाघर सैर को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें :-

छतबीर चिड़ियाघर से 22 कि.मी. पर रॉक गार्डन है और छतबीर चिड़ियाघर से दोपहर 1:30 बजे रॉक गार्डन  के लिए हमलोग निकल पड़े। रॉक गार्डन के बाहर, गर्मी होने के बावजूद, बहुत गहमा-गहमी थी। बाहर से ही रॉक गार्डन अपने सौन्दर्य की  छटा बिखेड़ रहा  था।


40 एकड़ में फैला इस रॉक गार्डन के अंदर प्रवेश करते ही ऐसा लगा की हमलोग अद्भुत लोक में आ गए हैं। शीतल जल के स्पर्श से हवा ठंडक प्रदान कर रही थी।  मौसम का मिजाज गर्म था, परंतु कला के इस सभागार में मिश्रित मौसम की अनुभूति हो रही थी। जल, प्रकृति एवं कला  का अनूठा संगम है, रॉक गार्डन।

रॉक गार्डन, आगरा के ताजमहल के बाद दूसरा सबसे ज्यादा देखा जाने वाला पर्यटन स्थल है। प्रतिदिन लगभग 5000 पर्यटक इसे देखने आते हैं।

नेक चंद सैनी जी के सपनों का रॉक गार्डन, चंडीगढ़ के सेक्टर एक में सुखना झील और केपिटल कॉम्प्लेक्स के बीच में स्थित है। ऐसे तो नेक चंद जी को अपने सपनों के संसार का नाम रॉक गार्डेन रखे जाने पर आपत्ति थी अपितु वो तो इसको अपने गाँव और सुखना लेक से जोड़ कर देखते थे, इसलिए वे इसे "सुखरानी की दुनिया" मानते थे, जिसमें दुनिया के सभी प्राणियों एवं प्रकृति का समावेश था।

जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के पहले आधुनिक शहर चंडीगढ़ की कल्पना की। चंडीगढ़ अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर अपनी वास्तुकला और योजनाबद्ध शहरी डिजाइन के लिए जाना जाता है। शहर का  मास्टर प्लान, स्विस-फ्रेंच वास्तुकार ली कार्बुजिए द्वारा तैयार किया गया था। इसका निर्माण कार्य सन् 1950 से शुरू हो कर सन् 1960 में बनकर तैयार हो गया। 1951 में नेक चंद जी इस प्रोजेक्ट के साथ रोड इंस्पेक्टर पद की  हैसियत से जुड़े।

चंडीगढ़ शहर, शिवालिक पहाड़ियों के छाँव में बसा हुआ है। नेक चंद जी को शहर के बाहर जंगलों के बीच एक गुप्त स्थान दिखा तथा वहां पर वे प्रत्येक शाम के बाद 18 साल तक अज्ञातवास की तरह जीवन जीते हुए शहर के निर्माण से निकले बेकार सामानों से, अपने सपनों का संसार को कलात्मक ढंग से सजाया। सन् 1975 में चंडीगढ़ प्रशासन को 12 एकड़ में फैले इस अद्भुत स्थान का पता चला। आशा-निराशा के बीच इस स्थान को सन् 1976 में सार्वजनिक स्थान घोषित किया गया और नेक चंद जी को सब -डिवीजनल इंजीनियर, रॉक गार्डन का पद  और 50 मजदूर दिए गए जिससे वे पूरे समय अपने काम पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

23 सितम्बर 1983 को, भारतीय डाक विभाग ने रॉक गार्डन की तस्वीर वाला  डाक टिकट मुद्रित किया।







आइए ! तस्वीरों के माध्यम से रॉक गार्डन का दर्शन आप भी करें।
















हेल्प-मी  - मैं रॉक-गार्डेन में फंस गया हूँ। 


















- © राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"