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Friday, April 14, 2017

कछुआ








कछुआ
  
नहीं! मैं केकड़ा नहीं,
मैं कछुआ हूँ । 

जब कोई मेरी पीठ थपथपाता है,
तो खुद को समेट लेता हूँ,
अपने खोल के अंदर,
नहीं होता आत्ममुग्ध,
और नहीं डसता उसे,
जो पीठ थपथपाते हैं मेरी,
केकड़े की तरह । 

नहीं दौड़ सकता मैं,
इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में,
नहीं काट सकता किसी को
केकड़े की तरह । 

हाँ! मैं नहीं करता प्रतिस्पर्धा अपनों से,
नहीं खींचता टांगें अपनों की,
केकड़े की तरह । 

मुझे सब कुछ पाने की जल्दी नहीं,
मुझे विश्वास है अपनी लगन पर
मंजिल अवश्य मिलेगी,
मंजिल पाने के लिए,
नहीं खा सकता अपनों को,
केकड़े की तरह। 

नहीं! मैं केकड़ा नहीं,
मैं कछुआ हूँ ।   

©  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"



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